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तत्त्व ज्ञान 07

 *📒📕     तत्व ज्ञान -【07】    📗📘*
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           *▪पहला बोल - गति चार ▪*
*यदि हम अपने चारों ओर देखते हैं, तो हमें न केवल पुरुष, महिलायें, लड़के, लड़कियां दिखाई देखते हैं, बल्कि बिल्लियां, कुत्ते, पक्षी, कीड़े, मकोड़े, पौधे आदि भी दिखाई देते हैं। यह देखा जा सकता है कि इस ब्रह्मांड में जीव के विभिन्न रूप हैं।*

*किन्तु कुछ भी स्थायी नहीं है। हर सेकंड कोई मरता है तो कोई जन्म लेता है। जब कोई मरता है तो यह जिज्ञासा उत्पन्न हो सकती है कि मरने वालों के साथ क्या होता है, और कौन तय करता है कि वह किस रूप में पैदा होना चाहिए। कर्म सिद्धांत पर आधारित बहुत ही सरल और ठोस तार्किक तरीके से जैन दर्शन हमें यह बताता है कि आत्मा अमर है। जन्म और मरण से आत्मा का अस्तित्व नहीं मिटता। आत्मा से जुड़े कर्मों के कारण जीव का जन्म और मृत्यु का चक्र अनवरत जारी रहता है। वे इस संसार में भटकते रहते है। जब तक आत्मा अपने कर्मों से छुटकारा नहीं पा लेती तब तक वे अलग अलग रूप में जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं हो सकते।*

*तो जो संसारी जीव है, जिनके साथ कर्म जुड़े हुए हैं, उनकी भवस्थितियां या जन्म स्थितियां चार है। उन्हें चार गति कहते है-*
*1. नरक-गति*
*2. तिर्यञ्च-गति*
*3. मनुष्य-गति*
*4. देव-गति*

*गति शब्द का अर्थ है- चलना, एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना। परन्तु यहाँ गति शब्द का व्यवहार एक जन्म-स्थिति से दूसरी जन्म स्थिति को या एक अवस्था से दूसरी अवस्था को पाने के अर्थ में हुआ है। जैसे- मनुष्य अवस्था में जीव मनुष्य गति कहलाता है। और वही जीव तिर्यञ्च अवस्था को प्राप्त हो गया तो हम उसे तिर्यञ्च गति कहेंगे।*
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*🙏आगम असम्मत्त कुछ भी लिखा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।*
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