*📒📕 तत्व ज्ञान -【06】 📗📘*
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*अभी तक हमने पढ़ा कि जीवों के मुख्य रूप से दो भेद किये गए हैं- सिद्ध जीव और संसारी जीव। जीवों का दूसरा विभाग है- संसारी। 'संसरति इति संसारी' जो संसरण करता है, एक जन्म के बाद दूसरा जन्म ग्रहण करता है, वह संसारी जीव कहलाता है।*
*प्रश्न उठता है- जीव जन्म-मरण क्यों करता है ? दशवैकालिक सूत्र में कहा गया है- आत्मा के भीतर जब तक क्रोध, मान, माया और लोभ रहते हैं, वे आत्मा को आगे जाने के लिए प्रेरित करते हैं। जैसे ही कषाय समाप्त हो जाते हैं, आत्मा मुक्त हो जाती है और हमेशा के लिए परमात्मा के रूप में अवस्थित हो जाती है।*
*आत्मा शाश्वत है। वह कभी समाप्त नहीं होती है। उसका अस्तित्व हमेशा रहता है। वह शरीर का परिवर्तन करती रहती है। गीता में कहा गया है-*
*वासांसि जीर्णानि यथा विहाय,*
*नवानि गह्वाती नरोस्पराणि।*
*तथा शरीराणि विहाय जीर्णा*
*न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।*
*जैसे आदमी पुराने वस्त्रों को छोड़कर नए वस्त्रों को धारण कर लेता है, उसी प्रकार आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर धारण कर लेती है। वह कभी नष्ट नहीं होती।*
*तो, वे जीव, जो कषाय और राग-द्वेष से युक्त है और उसके परिणाम स्वरुप बार-बार जन्म-मरण को प्राप्त होते है, वे संसारी जीव कहलाते है।*
*यहां हम यह बात और समझ लें कि तीर्थंकर भी संसारी है। हम जन्म मृत्यु करने वाले हैं और तीर्थंकर भी मृत्यु को प्राप्त होने वाले है। हम संसारी अवस्था के प्राणी है और वे भी संसारी है।*
*यहां यह जिज्ञासा उत्पन्न हो सकती है कि सिद्ध आत्माएं संपूर्णत्या विशुद्ध होती है। फिर भी अर्हत, तीर्थंकर को इतना महत्त्व क्यों दिया गया है ? इसका कारण हमारा स्वार्थ भाव है, क्योंकि जिससे स्वार्थ की सिद्धि होती है, उसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। यह सामान्य सा नियम है, भले साधु-संस्था को देख ले, भले गृहस्थ को देख ले। जिस आदमी से स्वार्थ की सिद्धि होती है, उस आदमी को अधिक महत्त्व दिया जाता है। यह कोई इतनी बुरी बात भी नहीं है। जो कोई हमारे काम आये, उसके प्रति विशेष भाव हो भी सकता है।*
*हमें धर्म का बोध देने वाले अर्हत् है। सिद्ध भगवान तो हमें कोई बात बताते नहीं है और न हमें प्रवचन सुनाते हैं। हमारे स्वार्थ की सिद्धि तो अर्हतों से होती है, इसीलिए हमने अर्हत् को ज्यादा महत्व दिया है। नमस्कार महामन्त्र में भी अर्हत् को पहले नमस्कार किया गया है और सिद्धों को नम्बर दो का स्थान दिया गया है। संसार में तो स्वार्थ से मुक्ति मिलना कठिन है। अध्यात्म-जगत में भी किसी अंश में स्वार्थ से मुक्ति मिलना मुश्किल है। इसे हम यों भी कह सकते है कि अरिहंत, संसारी जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं इसलिए हितकारी होने से पहले अरिहंत भगवान को नमस्कार किया गया है।*
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*🙏आगम असम्मत्त कुछ भी लिखा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।*
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*अभी तक हमने पढ़ा कि जीवों के मुख्य रूप से दो भेद किये गए हैं- सिद्ध जीव और संसारी जीव। जीवों का दूसरा विभाग है- संसारी। 'संसरति इति संसारी' जो संसरण करता है, एक जन्म के बाद दूसरा जन्म ग्रहण करता है, वह संसारी जीव कहलाता है।*
*प्रश्न उठता है- जीव जन्म-मरण क्यों करता है ? दशवैकालिक सूत्र में कहा गया है- आत्मा के भीतर जब तक क्रोध, मान, माया और लोभ रहते हैं, वे आत्मा को आगे जाने के लिए प्रेरित करते हैं। जैसे ही कषाय समाप्त हो जाते हैं, आत्मा मुक्त हो जाती है और हमेशा के लिए परमात्मा के रूप में अवस्थित हो जाती है।*
*आत्मा शाश्वत है। वह कभी समाप्त नहीं होती है। उसका अस्तित्व हमेशा रहता है। वह शरीर का परिवर्तन करती रहती है। गीता में कहा गया है-*
*वासांसि जीर्णानि यथा विहाय,*
*नवानि गह्वाती नरोस्पराणि।*
*तथा शरीराणि विहाय जीर्णा*
*न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।*
*जैसे आदमी पुराने वस्त्रों को छोड़कर नए वस्त्रों को धारण कर लेता है, उसी प्रकार आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर धारण कर लेती है। वह कभी नष्ट नहीं होती।*
*तो, वे जीव, जो कषाय और राग-द्वेष से युक्त है और उसके परिणाम स्वरुप बार-बार जन्म-मरण को प्राप्त होते है, वे संसारी जीव कहलाते है।*
*यहां हम यह बात और समझ लें कि तीर्थंकर भी संसारी है। हम जन्म मृत्यु करने वाले हैं और तीर्थंकर भी मृत्यु को प्राप्त होने वाले है। हम संसारी अवस्था के प्राणी है और वे भी संसारी है।*
*यहां यह जिज्ञासा उत्पन्न हो सकती है कि सिद्ध आत्माएं संपूर्णत्या विशुद्ध होती है। फिर भी अर्हत, तीर्थंकर को इतना महत्त्व क्यों दिया गया है ? इसका कारण हमारा स्वार्थ भाव है, क्योंकि जिससे स्वार्थ की सिद्धि होती है, उसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। यह सामान्य सा नियम है, भले साधु-संस्था को देख ले, भले गृहस्थ को देख ले। जिस आदमी से स्वार्थ की सिद्धि होती है, उस आदमी को अधिक महत्त्व दिया जाता है। यह कोई इतनी बुरी बात भी नहीं है। जो कोई हमारे काम आये, उसके प्रति विशेष भाव हो भी सकता है।*
*हमें धर्म का बोध देने वाले अर्हत् है। सिद्ध भगवान तो हमें कोई बात बताते नहीं है और न हमें प्रवचन सुनाते हैं। हमारे स्वार्थ की सिद्धि तो अर्हतों से होती है, इसीलिए हमने अर्हत् को ज्यादा महत्व दिया है। नमस्कार महामन्त्र में भी अर्हत् को पहले नमस्कार किया गया है और सिद्धों को नम्बर दो का स्थान दिया गया है। संसार में तो स्वार्थ से मुक्ति मिलना कठिन है। अध्यात्म-जगत में भी किसी अंश में स्वार्थ से मुक्ति मिलना मुश्किल है। इसे हम यों भी कह सकते है कि अरिहंत, संसारी जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं इसलिए हितकारी होने से पहले अरिहंत भगवान को नमस्कार किया गया है।*
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*🙏आगम असम्मत्त कुछ भी लिखा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।*
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