*📒📕 तत्व ज्ञान -【08】 📗📘*
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*▪पहला बोल - गति चार ▪*
*पिछली कड़ी में हमने पढ़ा कि संसारी जीव की भवस्थितियां चार है। जिन्हें चार गति कहते है- नरक गति, तिर्यञ्च गति, मनुष्य गति और देव गति।*
*नरक गति-- वह स्थान, जहां जीव प्रकृष्ट पापजन्य दुःखों का वेदन करते है, वह नरक कहलाता है। इनमें जो जीव उत्पन्न होते हैं, वो नारक कहलाते है। या हम यों भी कह सकते हैं, जहाँ सद्भाग्य- विकल जीव उत्पन्न होते हैं और जहाँ सदवेदना का अभाव है, उन स्थानों को निरय या नरक कहा जाता है और वहां उत्पन्न होने वाले जीव नैरकीय कहलाते हैं। वे जीव नैरकीय आयुष्य से बंधे हुए वहां रहते हैं।*
*चार गतियों में से मनुष्य गति और तिर्यञ्च गति तो हमारे सामने हैं, किन्तु देव गति याने स्वर्ग और नरक गति याने नरक हमारे प्रत्यक्ष नहीं है। तब यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि आखिर यह स्वर्ग और नरक है कहाँ ! जैन मान्यतानुसार इन चार गति के जीवों का समावेश लोक में होता है। अब प्रश्न यह उठता है कि लोक क्या है?*
*इस अनन्त आकाश में प्रतिदिन होने वाले चन्द्र-सूर्य के उदयास्त को तथा झिलमिलाते अनगिनत तारों को देखकर चिंतन करें तो मन में विश्व के विस्तार की परिकल्पना जागृत होती है। विचार आता है कि नीचे ऊपर और दायें-बांये यह लोक (विश्व) कितनी दुरी तक फैला हुआ है ? यह असीम, अनंत है या ससीम सान्त है ?*
*अनंत आकाश को दो भागों में विभक्त किया गया है- लोक और अलोक। आकाश के जिस भाग में धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय आदि छह ही द्रव्य (छह द्रव्यों को हम बीसवें बोल में विस्तार से समझेंगे) है उस स्थान को लोक कहा गया है। लोक को हम विश्व, जगत, ब्रह्माण्ड आदि नामों से भी जानते हैं। जहाँ आकाश के अतिरिक्त कोई द्रव्य नहीं है, उस स्थान को अलोक कहा गया है।*
*जैसे किसी विशाल स्थान के मध्य में एक छींका लटका दिया जाये उसी प्रकार अलोक के मध्य में लोक हैं। जो नीचे से पलयंक के जैसा, मध्य में वज्र के समान और ऊपर से खड़े मृदंग जैसा है। इस प्रकार यह लोक नीचे विस्तीर्ण, मध्य में संक्षिप्त और उध्र्व मुख मृदंग के समान है।*
*जैसे कोई पुरुष अपने दोनों पैरों को फैलाकर और दोनों हाथों को कमर पर रखकर खड़ा हो, उसका जैसा आकार होता है ठीक इसी प्रकार का लोक का आकार होता है।*
*इसको हम इस प्रकार और अच्छी तरह से समझ सकते हैं कि हम तीन दीपक लें। एक दीपक को जमीन पर उल्टा रख लें। फिर उसके ऊपर दूसरा दीपक सीधा रखे तथा सीधे दीपक के ऊपर तीसरा दीपक फिर उल्टा रख दें तो इस तरह जो मॉडल तैयार होता है, लोक की आकृति ठीक इसी तरह की है।*
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*🙏आगम असम्मत्त कुछ भी लिखा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।*
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*▪पहला बोल - गति चार ▪*
*पिछली कड़ी में हमने पढ़ा कि संसारी जीव की भवस्थितियां चार है। जिन्हें चार गति कहते है- नरक गति, तिर्यञ्च गति, मनुष्य गति और देव गति।*
*नरक गति-- वह स्थान, जहां जीव प्रकृष्ट पापजन्य दुःखों का वेदन करते है, वह नरक कहलाता है। इनमें जो जीव उत्पन्न होते हैं, वो नारक कहलाते है। या हम यों भी कह सकते हैं, जहाँ सद्भाग्य- विकल जीव उत्पन्न होते हैं और जहाँ सदवेदना का अभाव है, उन स्थानों को निरय या नरक कहा जाता है और वहां उत्पन्न होने वाले जीव नैरकीय कहलाते हैं। वे जीव नैरकीय आयुष्य से बंधे हुए वहां रहते हैं।*
*चार गतियों में से मनुष्य गति और तिर्यञ्च गति तो हमारे सामने हैं, किन्तु देव गति याने स्वर्ग और नरक गति याने नरक हमारे प्रत्यक्ष नहीं है। तब यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि आखिर यह स्वर्ग और नरक है कहाँ ! जैन मान्यतानुसार इन चार गति के जीवों का समावेश लोक में होता है। अब प्रश्न यह उठता है कि लोक क्या है?*
*इस अनन्त आकाश में प्रतिदिन होने वाले चन्द्र-सूर्य के उदयास्त को तथा झिलमिलाते अनगिनत तारों को देखकर चिंतन करें तो मन में विश्व के विस्तार की परिकल्पना जागृत होती है। विचार आता है कि नीचे ऊपर और दायें-बांये यह लोक (विश्व) कितनी दुरी तक फैला हुआ है ? यह असीम, अनंत है या ससीम सान्त है ?*
*अनंत आकाश को दो भागों में विभक्त किया गया है- लोक और अलोक। आकाश के जिस भाग में धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय आदि छह ही द्रव्य (छह द्रव्यों को हम बीसवें बोल में विस्तार से समझेंगे) है उस स्थान को लोक कहा गया है। लोक को हम विश्व, जगत, ब्रह्माण्ड आदि नामों से भी जानते हैं। जहाँ आकाश के अतिरिक्त कोई द्रव्य नहीं है, उस स्थान को अलोक कहा गया है।*
*जैसे किसी विशाल स्थान के मध्य में एक छींका लटका दिया जाये उसी प्रकार अलोक के मध्य में लोक हैं। जो नीचे से पलयंक के जैसा, मध्य में वज्र के समान और ऊपर से खड़े मृदंग जैसा है। इस प्रकार यह लोक नीचे विस्तीर्ण, मध्य में संक्षिप्त और उध्र्व मुख मृदंग के समान है।*
*जैसे कोई पुरुष अपने दोनों पैरों को फैलाकर और दोनों हाथों को कमर पर रखकर खड़ा हो, उसका जैसा आकार होता है ठीक इसी प्रकार का लोक का आकार होता है।*
*इसको हम इस प्रकार और अच्छी तरह से समझ सकते हैं कि हम तीन दीपक लें। एक दीपक को जमीन पर उल्टा रख लें। फिर उसके ऊपर दूसरा दीपक सीधा रखे तथा सीधे दीपक के ऊपर तीसरा दीपक फिर उल्टा रख दें तो इस तरह जो मॉडल तैयार होता है, लोक की आकृति ठीक इसी तरह की है।*
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*🙏आगम असम्मत्त कुछ भी लिखा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।*
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