*📒📕 तत्व ज्ञान -【03】 📗📘*
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*जैन दर्शन में नव तत्व माने गए हैं। आचार्य उमा स्वाति, जो जैन परम्परा के महान आचार्य हुए हैं, ने तत्वार्थ सूत्र में सात तत्वों का उल्लेख भी किया है। सात और नव की संख्यां में कोई खास अंतर नहीं है। पूण्य और पाप को अलग से न गिना जाये तो नौ हो जाते हैं और अलग गिनती करने पर सात रह जाते हैं, यह विवक्षा है।*
*दुनिया में मूल तत्व दो हैं- जीव और अजीव। इन दो के विस्तार से सात बन सकते हैं, नौ बन सकते हैं और सैंकड़ों भी बनाये जा सकते हैं।*
*नौ तत्वों में जीव, अजीव, पूण्य, पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष हैं। इनमें चार युगल है। ये युगल भी ऐसे जो एक- दूसरे के विपरीत हैं। जीव से विपरीत अजीव, पूण्य से विपरीत पाप, आश्रव से विपरीत संवर और बंध से विपरीत मोक्ष। अर्थात ये सब विरोधी स्वभाव वाले हैं।*
*नौ तत्वों में पहला तत्व है- जीव। 'चैतन्यलक्षणों जीवः' जिसमे चैतन्य है, जानने की प्रवृति है, अनुभूति की क्षमता है, वह जीव है। इस दुनिया में एक-दो-तीन नहीं अनंत-अनंत जीव है।*
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*जैन दर्शन में नव तत्व माने गए हैं। आचार्य उमा स्वाति, जो जैन परम्परा के महान आचार्य हुए हैं, ने तत्वार्थ सूत्र में सात तत्वों का उल्लेख भी किया है। सात और नव की संख्यां में कोई खास अंतर नहीं है। पूण्य और पाप को अलग से न गिना जाये तो नौ हो जाते हैं और अलग गिनती करने पर सात रह जाते हैं, यह विवक्षा है।*
*दुनिया में मूल तत्व दो हैं- जीव और अजीव। इन दो के विस्तार से सात बन सकते हैं, नौ बन सकते हैं और सैंकड़ों भी बनाये जा सकते हैं।*
*नौ तत्वों में जीव, अजीव, पूण्य, पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष हैं। इनमें चार युगल है। ये युगल भी ऐसे जो एक- दूसरे के विपरीत हैं। जीव से विपरीत अजीव, पूण्य से विपरीत पाप, आश्रव से विपरीत संवर और बंध से विपरीत मोक्ष। अर्थात ये सब विरोधी स्वभाव वाले हैं।*
*नौ तत्वों में पहला तत्व है- जीव। 'चैतन्यलक्षणों जीवः' जिसमे चैतन्य है, जानने की प्रवृति है, अनुभूति की क्षमता है, वह जीव है। इस दुनिया में एक-दो-तीन नहीं अनंत-अनंत जीव है।*
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