*📒📕 तत्व ज्ञान -【09】 📗📘*
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*▪पहला बोल - गति चार ▪*
*कल हमने समझा था कि जैसे कोई पुरुष अपने दोनों पैरो को फैलाकर और दोनों हाथों को कमर पर रखकर खड़ा हो, उसका जैसा आकार होता है ठीक इसी प्रकार का लोक का आकार है। कमर के नीचे के भाग को अधो-लोक, ऊपर के भाग को ऊर्ध्वलोक और कटि-स्थानीय भाग को मध्य लोक कहते हैं। तो इस तरह जैन दर्शन के अनुसार 'लोक' तीन भाग में विभाजित है-*
*1. ऊर्ध्व लोक*
*2. मध्य लोक*
*3. अधोलोक*
*इस तीन विभाग वाले लोक को लोकाकाश कहा जाता है, क्योंकि इसके भीतर ही जीव- पुद्गलादि सभी चेतन और अचेतन द्रव्य पाये जाते हैं।*
*लोकाकाश की ऊंचाई 14 रज्जु है। यह अधोलोक में सबसे नीचे अर्थात तल भाग में 7 रज्जु चौड़ा है। उस से ऊपर अनुक्रम से कम होता हुआ 7 रज्जु ऊपर आ जाने पर 1 रज्जु बराबर चौड़ा रहता है। तत्पश्चात ऊपर चौड़ा होता हुआ जब 3 1/2 रज्जु ऊपर उठे तब 5 रज्जु चौड़ा होता है। उसके बाद ऊपर कम होता हुआ क्रमशः 3 1/2 रज्जु पर अंत में 1 रज्जु चौड़ा रहता है। इस प्रकार संपूर्ण लोक नीचे से ऊपर तक चौदह रज्जु लम्बा है। घनाकार के नाप से 343 घन रज्जु प्रमाण है। सम्पूर्ण लोक के विषम स्थान को सम करने से सात रज्जु लम्बा, सात रज्जु चौड़ा और सात रज्जु ऊँचा होता है और उसका घन करने से 7×7×7= 343 रज्जु होता है।*
*जिस प्रकार घर के मध्य भाग में स्तम्भ हो, ठीक उसी प्रकार लोक के मध्य भाग में एक रज्जु चौड़ा और चौदह रज्जु लम्बा स्तम्भ जैसा आकाश विभाग है, जो 'त्रसनाड़ी' कहलाता है। उस त्रसनाड़ी में त्रस और स्थावर दोनों प्रकार के जीव है, जबकि त्रसनाड़ी के बाहर लोकाकाश में केवल एकेन्द्रिय स्थावर जीव ही होते हैं।*
*अभी हम जब लोक का स्वरूप समझ रहे थे तब बार-बार एक शब्द का प्रयोग हुआ है, वह है- रज्जु। यह रज्जु क्या है ? यह क्षेत्र सम्बन्धी मापक है। हम लोक की रचना से सम्बंधित कुछ अन्य शब्दों के अर्थ भी यहाँ समझ लेते हैं क्योंकि ये शब्द बार बार उपयोग में आएंगे-*
*8 जौ के दाने = 1 अंगुल*
*12 अंगुल = 1 बिलांद*
*2 बिलांद = 1 हाथ*
*4 हाथ = 1 धनुष*
*2000 धनुष = 1 कोस*
*4 कोस = 1 लघु योजन*
*2000 कोस = 1 महायोजन*
*और*
*ऐसे असंख्यात महायोजन = 1 रज्जु!*
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*🙏आगम असम्मत्त कुछ भी लिखा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।*
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*▪पहला बोल - गति चार ▪*
*कल हमने समझा था कि जैसे कोई पुरुष अपने दोनों पैरो को फैलाकर और दोनों हाथों को कमर पर रखकर खड़ा हो, उसका जैसा आकार होता है ठीक इसी प्रकार का लोक का आकार है। कमर के नीचे के भाग को अधो-लोक, ऊपर के भाग को ऊर्ध्वलोक और कटि-स्थानीय भाग को मध्य लोक कहते हैं। तो इस तरह जैन दर्शन के अनुसार 'लोक' तीन भाग में विभाजित है-*
*1. ऊर्ध्व लोक*
*2. मध्य लोक*
*3. अधोलोक*
*इस तीन विभाग वाले लोक को लोकाकाश कहा जाता है, क्योंकि इसके भीतर ही जीव- पुद्गलादि सभी चेतन और अचेतन द्रव्य पाये जाते हैं।*
*लोकाकाश की ऊंचाई 14 रज्जु है। यह अधोलोक में सबसे नीचे अर्थात तल भाग में 7 रज्जु चौड़ा है। उस से ऊपर अनुक्रम से कम होता हुआ 7 रज्जु ऊपर आ जाने पर 1 रज्जु बराबर चौड़ा रहता है। तत्पश्चात ऊपर चौड़ा होता हुआ जब 3 1/2 रज्जु ऊपर उठे तब 5 रज्जु चौड़ा होता है। उसके बाद ऊपर कम होता हुआ क्रमशः 3 1/2 रज्जु पर अंत में 1 रज्जु चौड़ा रहता है। इस प्रकार संपूर्ण लोक नीचे से ऊपर तक चौदह रज्जु लम्बा है। घनाकार के नाप से 343 घन रज्जु प्रमाण है। सम्पूर्ण लोक के विषम स्थान को सम करने से सात रज्जु लम्बा, सात रज्जु चौड़ा और सात रज्जु ऊँचा होता है और उसका घन करने से 7×7×7= 343 रज्जु होता है।*
*जिस प्रकार घर के मध्य भाग में स्तम्भ हो, ठीक उसी प्रकार लोक के मध्य भाग में एक रज्जु चौड़ा और चौदह रज्जु लम्बा स्तम्भ जैसा आकाश विभाग है, जो 'त्रसनाड़ी' कहलाता है। उस त्रसनाड़ी में त्रस और स्थावर दोनों प्रकार के जीव है, जबकि त्रसनाड़ी के बाहर लोकाकाश में केवल एकेन्द्रिय स्थावर जीव ही होते हैं।*
*अभी हम जब लोक का स्वरूप समझ रहे थे तब बार-बार एक शब्द का प्रयोग हुआ है, वह है- रज्जु। यह रज्जु क्या है ? यह क्षेत्र सम्बन्धी मापक है। हम लोक की रचना से सम्बंधित कुछ अन्य शब्दों के अर्थ भी यहाँ समझ लेते हैं क्योंकि ये शब्द बार बार उपयोग में आएंगे-*
*8 जौ के दाने = 1 अंगुल*
*12 अंगुल = 1 बिलांद*
*2 बिलांद = 1 हाथ*
*4 हाथ = 1 धनुष*
*2000 धनुष = 1 कोस*
*4 कोस = 1 लघु योजन*
*2000 कोस = 1 महायोजन*
*और*
*ऐसे असंख्यात महायोजन = 1 रज्जु!*
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*🙏आगम असम्मत्त कुछ भी लिखा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।*
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