*📒📕 तत्व ज्ञान -【02】 📗📘*
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*भगवान महावीर ने कहा -*
*जो जीवे वि न याणाइ, अजीवे वि न याणइ।*
*जीवाजीवे अयाणंतो, कहं सो नाहिइ संजमं।।*
*जो जीव को नहीं जानता, अजीव को नही जानता, जीव और अजीव को नही जानता, वह संयम को कैसे जान सकता है? इसलिए अहिंसक मनुष्य के लिए, अहिंसा की साधना में जीव व अजीव का ज्ञान होना अनिवार्य है।*
*इसका यद्यपि आगम शास्त्रों में विशद विवेचन किया गया है। परन्तु आगम शास्त्रों को सही रूप में पढ़ लेना, उनके अर्थ एवं मर्म को हृदयंगम कर लेना हम जैसे सामान्य लोगों के लिए कठिन होता है। अतः संग्रहकर्ता ने आगम के सारांश रूप में सरल भाषा में थोकड़ों का निर्माण किया है। इसमें पच्चीस-बोल पच्चीस वाक्यों का समुदाय है। इसमें जीव- अजीव का विश्लेषण सरल व वैज्ञानिक ढंग से किया है।*
*यह जैन धर्म को समझने का प्रवेश द्वार भी कहलाता है। जिस प्रकार अंग्रेजी भाषा को पढ़ने- लिखने के लिए ए, बी, सी, डी आदि का ज्ञान पहले अनिवार्य होता है। गणित सिखने के लिए अंको का ज्ञान तथा जोड़, बाकी, गुणा व भाग का ज्ञान अनिवार्य होता है ठीक उसी प्रकार जैन धर्म की बहुविध विशेषताओं को जानने के लिए पच्चीस बोल का थोकड़ा सबसे पहले पढ़ना-सीखना अनिवार्य है। एक दृष्टि से यह जैन दर्शन की कुंजी है।*
*मोक्ष की साधना के लिए उसके साधक व बाधक तत्वों की समुचित जानकारी आवश्यक है। पच्चीस बोल का थोकडा ऐसा सूत्रात्मक लघु ग्रन्थ है जिसको हृदयंगम कर ज्ञान-दर्शन-चारित्र की गहराई में उतरा जा सकता है और इसके माध्यम से आगम-ग्रन्थों के विशाल सागर का मंथन किया जा सकता है।*
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*भगवान महावीर ने कहा -*
*जो जीवे वि न याणाइ, अजीवे वि न याणइ।*
*जीवाजीवे अयाणंतो, कहं सो नाहिइ संजमं।।*
*जो जीव को नहीं जानता, अजीव को नही जानता, जीव और अजीव को नही जानता, वह संयम को कैसे जान सकता है? इसलिए अहिंसक मनुष्य के लिए, अहिंसा की साधना में जीव व अजीव का ज्ञान होना अनिवार्य है।*
*इसका यद्यपि आगम शास्त्रों में विशद विवेचन किया गया है। परन्तु आगम शास्त्रों को सही रूप में पढ़ लेना, उनके अर्थ एवं मर्म को हृदयंगम कर लेना हम जैसे सामान्य लोगों के लिए कठिन होता है। अतः संग्रहकर्ता ने आगम के सारांश रूप में सरल भाषा में थोकड़ों का निर्माण किया है। इसमें पच्चीस-बोल पच्चीस वाक्यों का समुदाय है। इसमें जीव- अजीव का विश्लेषण सरल व वैज्ञानिक ढंग से किया है।*
*यह जैन धर्म को समझने का प्रवेश द्वार भी कहलाता है। जिस प्रकार अंग्रेजी भाषा को पढ़ने- लिखने के लिए ए, बी, सी, डी आदि का ज्ञान पहले अनिवार्य होता है। गणित सिखने के लिए अंको का ज्ञान तथा जोड़, बाकी, गुणा व भाग का ज्ञान अनिवार्य होता है ठीक उसी प्रकार जैन धर्म की बहुविध विशेषताओं को जानने के लिए पच्चीस बोल का थोकड़ा सबसे पहले पढ़ना-सीखना अनिवार्य है। एक दृष्टि से यह जैन दर्शन की कुंजी है।*
*मोक्ष की साधना के लिए उसके साधक व बाधक तत्वों की समुचित जानकारी आवश्यक है। पच्चीस बोल का थोकडा ऐसा सूत्रात्मक लघु ग्रन्थ है जिसको हृदयंगम कर ज्ञान-दर्शन-चारित्र की गहराई में उतरा जा सकता है और इसके माध्यम से आगम-ग्रन्थों के विशाल सागर का मंथन किया जा सकता है।*
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