*📒📕 तत्व ज्ञान -【10】 📗📘*
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*▪पहला बोल - गति चार ▪*
*सापेक्षवाद के आविष्कर्ता प्रो. आइन्स्टीन ने लोक का व्यास एक करोड़ अस्सी लाख प्रकाशवर्ष माना है। 'एक प्रकाशवर्ष उस दुरी को कहते हैं जो प्रकाश की किरण 1,86,000 मील प्रति सैकण्ड के हिसाब से एक वर्ष में तय करती है।'*
*भगवान महावीर ने देवताओं की 'शीघ्र गति' की कल्पना से लोक की मोटाई को समझाया है। जैसे- छह देवता लोक का अन्त लेने के लिए 'शीघ्र गति' से छहों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊँची और नीची) में चले। ठीक उसी समय एक सेठ के घर में एक हजार वर्ष की आयु वाला एक पुत्र जन्मा...उसकी आयु समाप्त हो गयी। उसके बाद हजार वर्ष की आयु वाले उसके बेटे-पोते हुए। इस प्रकार सात पीढियां बीत गई। उनके नाम- गौत्र भी मिट गए, तब तक वे देवता चलते रहे, फिर भी लोक के अन्त तक नहीं पहुंचे। हाँ, वे चलते- चलते अधिक भाग पार कर गए। बाकी रहा वह भाग कम है- वे चले उसका असंख्यातवां भाग बाकी रहा है। जितना भाग चलना बाकी रहा है उससे असंख्यात गुणा भाग पार कर चुके हैं। यह लोक इतना बड़ा है।*
*यहाँ देवताओं की 'शीघ्र गति' से तात्पर्य यह है कि एक देवता मरु पर्वत की चूलिका पर खड़ा है- एक लाख योजन की ऊंचाई में खड़ा है। नीचे चारों दिशाओं में चार दिक् - कुमारिकाएं हाथ में बलि- पिण्ड लेकर बहिर्मुखी रहकर उस बलिपिण्ड को एक साथ फैंकती है। उस समय वह देवता दौड़ता है। चारों बलिपिण्डों को जमीन पर गिरने से पहले हाथ में ले लेता है। इस गति का नाम 'शीघ्रगति' है।*
*यह समस्त लोक सर्व और धनोदधि, धनवात और तनुवात इन तीन वलयों से वेष्टित है। अर्थात इनके आधार पर अवस्थित है। प्रथम वलय अधिक सघन है, अतः इसे धनोदधि कहते हैं। दूसरा वलय तीसरे वलय की अपेक्षा सघन है, अतः इसे धनवात कहा गया है। तीसरा वलय उक्त दोनों की अपेक्षा अत्यन्त सूक्ष्म या पतला है, इसलिए इसे तनुवात कहते हैं।*
*▪अधोलोक▪*
*भगवती तथा स्थानांगसूत्र की वृति में इस लोक के अधः परिणाम के कारण से अथवा क्षेत्र की अपेक्षा से कहा है कि बहुलता से वहां द्रव्यों के अशुभ परिणामों का संभव है, इसलिए अशुभ-अधोलोक, अथवा अधः नीचे है इसलिए अधोलोक कहते हैं। इस अधोलोक में नारको का निवास स्थान है।*
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*🙏आगम असम्मत्त कुछ भी लिखा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।*
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*▪पहला बोल - गति चार ▪*
*सापेक्षवाद के आविष्कर्ता प्रो. आइन्स्टीन ने लोक का व्यास एक करोड़ अस्सी लाख प्रकाशवर्ष माना है। 'एक प्रकाशवर्ष उस दुरी को कहते हैं जो प्रकाश की किरण 1,86,000 मील प्रति सैकण्ड के हिसाब से एक वर्ष में तय करती है।'*
*भगवान महावीर ने देवताओं की 'शीघ्र गति' की कल्पना से लोक की मोटाई को समझाया है। जैसे- छह देवता लोक का अन्त लेने के लिए 'शीघ्र गति' से छहों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊँची और नीची) में चले। ठीक उसी समय एक सेठ के घर में एक हजार वर्ष की आयु वाला एक पुत्र जन्मा...उसकी आयु समाप्त हो गयी। उसके बाद हजार वर्ष की आयु वाले उसके बेटे-पोते हुए। इस प्रकार सात पीढियां बीत गई। उनके नाम- गौत्र भी मिट गए, तब तक वे देवता चलते रहे, फिर भी लोक के अन्त तक नहीं पहुंचे। हाँ, वे चलते- चलते अधिक भाग पार कर गए। बाकी रहा वह भाग कम है- वे चले उसका असंख्यातवां भाग बाकी रहा है। जितना भाग चलना बाकी रहा है उससे असंख्यात गुणा भाग पार कर चुके हैं। यह लोक इतना बड़ा है।*
*यहाँ देवताओं की 'शीघ्र गति' से तात्पर्य यह है कि एक देवता मरु पर्वत की चूलिका पर खड़ा है- एक लाख योजन की ऊंचाई में खड़ा है। नीचे चारों दिशाओं में चार दिक् - कुमारिकाएं हाथ में बलि- पिण्ड लेकर बहिर्मुखी रहकर उस बलिपिण्ड को एक साथ फैंकती है। उस समय वह देवता दौड़ता है। चारों बलिपिण्डों को जमीन पर गिरने से पहले हाथ में ले लेता है। इस गति का नाम 'शीघ्रगति' है।*
*यह समस्त लोक सर्व और धनोदधि, धनवात और तनुवात इन तीन वलयों से वेष्टित है। अर्थात इनके आधार पर अवस्थित है। प्रथम वलय अधिक सघन है, अतः इसे धनोदधि कहते हैं। दूसरा वलय तीसरे वलय की अपेक्षा सघन है, अतः इसे धनवात कहा गया है। तीसरा वलय उक्त दोनों की अपेक्षा अत्यन्त सूक्ष्म या पतला है, इसलिए इसे तनुवात कहते हैं।*
*▪अधोलोक▪*
*भगवती तथा स्थानांगसूत्र की वृति में इस लोक के अधः परिणाम के कारण से अथवा क्षेत्र की अपेक्षा से कहा है कि बहुलता से वहां द्रव्यों के अशुभ परिणामों का संभव है, इसलिए अशुभ-अधोलोक, अथवा अधः नीचे है इसलिए अधोलोक कहते हैं। इस अधोलोक में नारको का निवास स्थान है।*
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*🙏आगम असम्मत्त कुछ भी लिखा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।*
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