*📒📕 तत्व ज्ञान -【04】 📗📘*
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*कल हमने पढ़ा था कि नौ तत्वों में पहला तत्व है- जीव। जीवों के मुख्य रूप से दो भेद किये गए हैं- सिद्ध जीव और संसारी जीव। सिद्ध जीव वे होते हैं, जो जन्म- मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष में अवस्थित हो जाते हैं। जिनके न शरीर है, न वाणी है और न ही मन है। वे अशरीर, अवाक् और अमन होते हैं। परम आनन्दमय, ज्ञानमय और शक्तिमय होते हैं। दूसरी भाषा में कहें तो जो आत्माएं कर्म-रज को धो-मांजकर पूर्णरूपेण उज्ज्वल बन जाती है, उन्हें सिद्ध कहते हैं।*
*सिद्ध वो हैं जिन्हें हम नमस्कार महामन्त्र के दूसरे पद "णमो सिद्धाणं" में नमस्कार करते हैं। सिद्धावस्था आत्मा की शुद्धावस्था है। वहां केवल जीव का ही अस्तित्व है। अनादिकाल से आत्मा के साथ चिपके हुए कर्म पुद्गल उस स्थिति में टूटकर अलग हो जाते हैं। वहां केवल आत्मा की ज्ञान-दर्शनमयी सत्ता का अस्तित्त्व है। उस अस्तित्त्व की पहचान परमात्मा, मुक्तात्मा, सिद्ध, परमेश्वर, ईश्वर आदि अनेक नामों से की जा सकती है।*
*यहां हम एक और बात अच्छी तरह से समझ लें कि जैन दर्शन अवतारवाद को स्वीकार नहीं करता। जैन दर्शन अवतारवाद को इस रूप में नहीं मानता कि कोई ईश्वर अवतार ग्रहण करें, जैसा की गीता में कहा गया है-*
*"यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः,*
*अभ्युतथानं अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।*
*परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्,*
*धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे।।"*
*जैन दर्शन का मन्तव्य है कि परमात्मा या विशुद्ध आत्मा कभी भी संसार में जन्म नहीं ले सकती। साधना के द्वारा इंसान भगवान् बन सकता है, किन्तु भगवान कभी इंसान के रूप में जन्म नहीं ले सकता। आदमी साधना, तपस्या आदि के द्वारा ऊँचा उठ सकता है और परमात्मा के रूप में प्रतिष्ठित हो सकता है।*
*सिद्ध या परमात्मा कोई भी व्यक्ति बन सकता है, यदि उसमें भव्यता हो, योग्यता हो। एक स्त्री भी सिद्धत्व को प्राप्त कर सकती है। एक पुरुष भी परमात्मा बन सकता है। जैन मुनि के वेश में रहनेवाला व्यक्ति भी सिद्ध हो सकता है और जैनेत्तर मुनि का वेश पहनने वाला व्यक्ति भी सिद्ध हो सकता है।*
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*🙏आगम असम्मत्त कुछ भी लिखा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।*
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*कल हमने पढ़ा था कि नौ तत्वों में पहला तत्व है- जीव। जीवों के मुख्य रूप से दो भेद किये गए हैं- सिद्ध जीव और संसारी जीव। सिद्ध जीव वे होते हैं, जो जन्म- मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष में अवस्थित हो जाते हैं। जिनके न शरीर है, न वाणी है और न ही मन है। वे अशरीर, अवाक् और अमन होते हैं। परम आनन्दमय, ज्ञानमय और शक्तिमय होते हैं। दूसरी भाषा में कहें तो जो आत्माएं कर्म-रज को धो-मांजकर पूर्णरूपेण उज्ज्वल बन जाती है, उन्हें सिद्ध कहते हैं।*
*सिद्ध वो हैं जिन्हें हम नमस्कार महामन्त्र के दूसरे पद "णमो सिद्धाणं" में नमस्कार करते हैं। सिद्धावस्था आत्मा की शुद्धावस्था है। वहां केवल जीव का ही अस्तित्व है। अनादिकाल से आत्मा के साथ चिपके हुए कर्म पुद्गल उस स्थिति में टूटकर अलग हो जाते हैं। वहां केवल आत्मा की ज्ञान-दर्शनमयी सत्ता का अस्तित्त्व है। उस अस्तित्त्व की पहचान परमात्मा, मुक्तात्मा, सिद्ध, परमेश्वर, ईश्वर आदि अनेक नामों से की जा सकती है।*
*यहां हम एक और बात अच्छी तरह से समझ लें कि जैन दर्शन अवतारवाद को स्वीकार नहीं करता। जैन दर्शन अवतारवाद को इस रूप में नहीं मानता कि कोई ईश्वर अवतार ग्रहण करें, जैसा की गीता में कहा गया है-*
*"यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः,*
*अभ्युतथानं अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।*
*परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्,*
*धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे।।"*
*जैन दर्शन का मन्तव्य है कि परमात्मा या विशुद्ध आत्मा कभी भी संसार में जन्म नहीं ले सकती। साधना के द्वारा इंसान भगवान् बन सकता है, किन्तु भगवान कभी इंसान के रूप में जन्म नहीं ले सकता। आदमी साधना, तपस्या आदि के द्वारा ऊँचा उठ सकता है और परमात्मा के रूप में प्रतिष्ठित हो सकता है।*
*सिद्ध या परमात्मा कोई भी व्यक्ति बन सकता है, यदि उसमें भव्यता हो, योग्यता हो। एक स्त्री भी सिद्धत्व को प्राप्त कर सकती है। एक पुरुष भी परमात्मा बन सकता है। जैन मुनि के वेश में रहनेवाला व्यक्ति भी सिद्ध हो सकता है और जैनेत्तर मुनि का वेश पहनने वाला व्यक्ति भी सिद्ध हो सकता है।*
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*🙏आगम असम्मत्त कुछ भी लिखा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।*
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