*📒📕 तत्व ज्ञान -【05】 📗📘*
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*कल हमने पढ़ा की सिद्धावस्था आत्मा की शुद्धावस्था है। प्रश्न हो सकता है कि आत्मा शाश्वत है तो क्या उसे देखा जा सकता है? तत्वविद्या में कहा गया है- आत्मा अमूर्त है। वह न लाल है, न काली है, न पीली है, न सफेद है, न हरी है। उसका न कोई रंग है न कोई रूप।*
*एक महात्माजी किसी गांव में गए। अनेक शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर 'आत्मा' पर लम्बा वक्तव्य दिया। एक युवक, जो अपने आप को बौद्धिक मानता था, बोला- महात्मन ! आपने प्रवचन दिया, बड़ा श्रम किया, इसके लिए आपके प्रति हम आभार ज्ञापित करते हैं। किन्तु बाबाजी ! इतना सुनने के बाद भी आत्मा के अस्तित्व में मेरा कोई विश्वास नहीं है। मैं नास्तिक दर्शन चार्वाक को मानता हूँ। जिसका सिद्धान्त है-*
*यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, तावत् वैषयिकं सुखम्।*
*भस्मीभूतस्य देहस्य, पुनरागमन कुतः?।।*
*जब तक जीओ, सुख से जीओ। वैषयिक सुखों का भोग करो। क्योंकि शरीर के नष्ट हो जाने के बाद पुनर्जन्म जैसा कुछ भी नहीं है। जो कुछ है, इसी जीवन में है। फिर भी मेरा आग्रह नहीं है। यदि आप मुझे आत्मा को हाथ में लेकर दिखा दें तो मैं मान लूंगा कि आत्मा भी कोई चीज है।*
*संत ने सोचा, इसे युक्ति से समझाना चाहिए। बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा- युवक ! तुमने कभी स्वप्न देखा है ? युवक प्रसन्न मुद्रा में बोला- हाँ महाराज ! कल रात ही मैंने बड़ा सुंदर स्वप्न देखा था। लोकसभा का चुनाव हुआ और उसमे मैं जीत गया। जोड़ तोड़ की राजनीती से मैं प्रधानमंत्री बन गया। मैंने स्वप्न में देखा कि मैंने प्रधानमंत्री बनते ही जी. एस. टी. को समाप्त करवा दिया, किसानों का कर्जा माफ़ करवा दिया। महाराज ! क्या क्या बताऊँ, आप यों समझ लीजिये कि मैं "नायक" फ़िल्म के अनिल कपूर की तरह काम किये जा रहा था। चारों तरफ मेरी जय- जयकार हो रही थी।*
*सन्यासी ने कहा- युवक ! मैं कैसे विश्वास करूँ कि तुमने स्वप्न देखा था। यदि स्वप्न को हाथ में लेकर दिखाओं तो मैं मान सकता हूँ कि तुमने सपना देखा था। युवक बोला- महात्मन् ! स्वप्न को तो नींद में ही देखा या भोगा जा सकता है। सन्यासी - जब तुम स्वप्न को हाथ में लेकर नहीं दिखा सकते तो मैं अमूर्त आत्मा को हाथ में लेकर कैसे दिखा सकता हूँ। युवक को बोध पाठ मिल गया।*
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*🙏आगम असम्मत्त कुछ भी लिखा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।*
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*कल हमने पढ़ा की सिद्धावस्था आत्मा की शुद्धावस्था है। प्रश्न हो सकता है कि आत्मा शाश्वत है तो क्या उसे देखा जा सकता है? तत्वविद्या में कहा गया है- आत्मा अमूर्त है। वह न लाल है, न काली है, न पीली है, न सफेद है, न हरी है। उसका न कोई रंग है न कोई रूप।*
*एक महात्माजी किसी गांव में गए। अनेक शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर 'आत्मा' पर लम्बा वक्तव्य दिया। एक युवक, जो अपने आप को बौद्धिक मानता था, बोला- महात्मन ! आपने प्रवचन दिया, बड़ा श्रम किया, इसके लिए आपके प्रति हम आभार ज्ञापित करते हैं। किन्तु बाबाजी ! इतना सुनने के बाद भी आत्मा के अस्तित्व में मेरा कोई विश्वास नहीं है। मैं नास्तिक दर्शन चार्वाक को मानता हूँ। जिसका सिद्धान्त है-*
*यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, तावत् वैषयिकं सुखम्।*
*भस्मीभूतस्य देहस्य, पुनरागमन कुतः?।।*
*जब तक जीओ, सुख से जीओ। वैषयिक सुखों का भोग करो। क्योंकि शरीर के नष्ट हो जाने के बाद पुनर्जन्म जैसा कुछ भी नहीं है। जो कुछ है, इसी जीवन में है। फिर भी मेरा आग्रह नहीं है। यदि आप मुझे आत्मा को हाथ में लेकर दिखा दें तो मैं मान लूंगा कि आत्मा भी कोई चीज है।*
*संत ने सोचा, इसे युक्ति से समझाना चाहिए। बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा- युवक ! तुमने कभी स्वप्न देखा है ? युवक प्रसन्न मुद्रा में बोला- हाँ महाराज ! कल रात ही मैंने बड़ा सुंदर स्वप्न देखा था। लोकसभा का चुनाव हुआ और उसमे मैं जीत गया। जोड़ तोड़ की राजनीती से मैं प्रधानमंत्री बन गया। मैंने स्वप्न में देखा कि मैंने प्रधानमंत्री बनते ही जी. एस. टी. को समाप्त करवा दिया, किसानों का कर्जा माफ़ करवा दिया। महाराज ! क्या क्या बताऊँ, आप यों समझ लीजिये कि मैं "नायक" फ़िल्म के अनिल कपूर की तरह काम किये जा रहा था। चारों तरफ मेरी जय- जयकार हो रही थी।*
*सन्यासी ने कहा- युवक ! मैं कैसे विश्वास करूँ कि तुमने स्वप्न देखा था। यदि स्वप्न को हाथ में लेकर दिखाओं तो मैं मान सकता हूँ कि तुमने सपना देखा था। युवक बोला- महात्मन् ! स्वप्न को तो नींद में ही देखा या भोगा जा सकता है। सन्यासी - जब तुम स्वप्न को हाथ में लेकर नहीं दिखा सकते तो मैं अमूर्त आत्मा को हाथ में लेकर कैसे दिखा सकता हूँ। युवक को बोध पाठ मिल गया।*
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*🙏आगम असम्मत्त कुछ भी लिखा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।*
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