*📒📕 तत्व ज्ञान -【01】 📗📘*
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*इस विराट संसार में प्रत्येक प्राणी सुख चाहता है। चाहता ही नहीं वरन्, सुख-प्राप्ति के लिए दिन-रात मेहनत भी करता है परन्तु फिर भी उसे सच्चा व स्थायी सुख प्राप्त नहीं हो पाता। क्यों ?*
*अगर इस प्रश्न पर चिंतन करें तो निष्कर्ष यह निकलता है कि अज्ञान और मोह के कारण प्राणी इन्द्रिय विषयों में प्राप्त क्षणिक रागात्मक सुखाभास को ही सच्चा सुख मानने लग जाता है। तथा उन्ही-उन्ही विषयों की प्राप्ति में दौड़ लगाता रहता है। परिणाम स्वरूप उसे आत्मिक सुख की अनुभूति हो ही नहीं पाती।*
*अब प्रश्न यह उठता है की आत्मिक सुख की प्राप्ति कैसे हो ? आत्मिक सुख की प्राप्ति हेतु तत्वज्ञान एवं सिद्धान्त बोध होना आवश्यक है क्योंकि बिना तत्व ज्ञान एवं सिद्धान्त बोध के दृढ श्रद्धान नहीं हो पाता तथा बिना दृढ श्रद्धान के आचरण सम्यक नहीं बन पाता है।*
*पढमं नाणं तओ दया - जैन दर्शन का यह समन्वयात्मक सिद्धान्त है। ज्ञान के बिना आचरण शक्य नहीं और आचरण के बिना ज्ञान की सार्थकता नहीं है। इसलिए ज्ञान और आचरण का समन्वय आवश्यक है।*
*आध्यात्मिक क्षेत्र में ज्ञान का तात्पर्य है मोक्ष और उसके साधन है- संयम, अहिंसा आदि का ज्ञान। और उसके लिए जरूरी है जीव अजीव का ज्ञान।..*
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*इस विराट संसार में प्रत्येक प्राणी सुख चाहता है। चाहता ही नहीं वरन्, सुख-प्राप्ति के लिए दिन-रात मेहनत भी करता है परन्तु फिर भी उसे सच्चा व स्थायी सुख प्राप्त नहीं हो पाता। क्यों ?*
*अगर इस प्रश्न पर चिंतन करें तो निष्कर्ष यह निकलता है कि अज्ञान और मोह के कारण प्राणी इन्द्रिय विषयों में प्राप्त क्षणिक रागात्मक सुखाभास को ही सच्चा सुख मानने लग जाता है। तथा उन्ही-उन्ही विषयों की प्राप्ति में दौड़ लगाता रहता है। परिणाम स्वरूप उसे आत्मिक सुख की अनुभूति हो ही नहीं पाती।*
*अब प्रश्न यह उठता है की आत्मिक सुख की प्राप्ति कैसे हो ? आत्मिक सुख की प्राप्ति हेतु तत्वज्ञान एवं सिद्धान्त बोध होना आवश्यक है क्योंकि बिना तत्व ज्ञान एवं सिद्धान्त बोध के दृढ श्रद्धान नहीं हो पाता तथा बिना दृढ श्रद्धान के आचरण सम्यक नहीं बन पाता है।*
*पढमं नाणं तओ दया - जैन दर्शन का यह समन्वयात्मक सिद्धान्त है। ज्ञान के बिना आचरण शक्य नहीं और आचरण के बिना ज्ञान की सार्थकता नहीं है। इसलिए ज्ञान और आचरण का समन्वय आवश्यक है।*
*आध्यात्मिक क्षेत्र में ज्ञान का तात्पर्य है मोक्ष और उसके साधन है- संयम, अहिंसा आदि का ज्ञान। और उसके लिए जरूरी है जीव अजीव का ज्ञान।..*
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