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Kavita ​सबको अपना बनाने के लिए हाथ जोड़ दिए मैंने​


दर्द कागज़ पर,
          ​मेरा बिकता रहा,
मैं बैचैन था,
          ​रातभर लिखता रहा..
छू रहे थे सब,
          ​बुलंदियाँ आसमान की,
मैं सितारों के बीच,
          ​चाँद की तरह छिपता रहा..
अकड होती तो,
          ​कब का टूट गया होता,
मैं था नाज़ुक डाली,
          ​जो सबके आगे झुकता रहा..
बदले यहाँ लोगों ने,
         ​रंग अपने-अपने ढंग से,
रंग मेरा भी निखरा पर,
         ​मैं मेहँदी की तरह पीसता रहा..
जिनको जल्दी थी,
         ​वो बढ़ चले मंज़िल की ओर,
मैं समन्दर से राज,
         ​गहराई से सीखता रहा..!!
"ज़िन्दगी कभी भी ले सकती है करवट...
तू गुमान न कर...
बुलंदियाँ छू हज़ार, मगर...
उसके लिए कोई 'गुनाह' न कर.
कुछ बेतुके झगड़े​,
  ​कुछ इस तरह खत्म कर दिए मैंने
जहाँ गलती नही भी थी मेरी​,
          ​फिर भी सबको अपना बनाने के लिए हाथ जोड़ दिए मैंने​ 

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