किसी पर झूठा आरोप लगा देना !
महासती सीता क्यों कलंकित हुई ?
जैन मान्यता के अनुसार कोई किसी को दंड नहीं देता,
दु:खी नहीं करता |
---
सीता का जीव पूर्व भव में वेगवती के रूप में था |
वह युवावस्था में कहीं घूमने निकली |
---
युवा सुदर्शन मुनि कायोत्सर्ग में खड़े थे |
मुनि दर्शन के लिए भीड़ उमड़ पड़ी |
वेगवती से यह सम्मान सहा नहीं गया |
उसने मलिन भाव से कहा -
" लोगों ! इसे क्या वंदना कर रहे हो ?
मैंने कल ही इस मुनि को एक स्त्री के साथ देखा था |
अभी उस स्त्री को कहीं भेज दिया गया है |
यह सुनते ही धिक्-धिक् करते हुए आधी भीड़ छंट गई |
जो बची वह मुनि को सताने लगी |
---
मुनि ने आरोप समाहित नहीं होने तक अन्न-जल का त्याग करके कायोत्सर्ग में रहने का संकल्प लिया |
देव प्रयोग से वेगवती का मुंह श्याम हो गया |
यह देखते ही पिता ताड़ गया |
पिता ने वेगवती को डांटते हुए कहा -
" तुरंत मुनि से क्षमायाचना करके आओ |"
वेगवती ने मुनि से क्षमायाचना की,
पर इस असत्य आचरण का प्रायश्चित्त नहीं किया |
---
उस पाप के कारण रावण के घर सीता के रूप में भोगा |
आखिर कलंकिता होना ही पड़ा |
*- शासन गौरव साध्वी श्री राजीमतीजी*
=======
नोट - सीता जी को जैन धर्म में "महासती" कहा जाता है |
जैसे भगवान महावीर के पिछले कर्म उनको
अलग-अलग भव में अनेक रूपों से आकर कष्ट देते रहे |
वैसे सीताजी की यह घटना जैन साहित्य में बताई गई है |
===
सन्देश - पहले तो ईर्ष्या,
फिर किसी के ऊपर झूठा आरोप लगाना |
अपने जीवन में खुद ही झाँक कर देखे कि
कोई ऐसा कर्म तो नहीं बांध रहे है -
किसी पर मिथ्या आरोप लगाकर - द्वेष-वश !
महासती सीता क्यों कलंकित हुई ?
जैन मान्यता के अनुसार कोई किसी को दंड नहीं देता,
दु:खी नहीं करता |
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सीता का जीव पूर्व भव में वेगवती के रूप में था |
वह युवावस्था में कहीं घूमने निकली |
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युवा सुदर्शन मुनि कायोत्सर्ग में खड़े थे |
मुनि दर्शन के लिए भीड़ उमड़ पड़ी |
वेगवती से यह सम्मान सहा नहीं गया |
उसने मलिन भाव से कहा -
" लोगों ! इसे क्या वंदना कर रहे हो ?
मैंने कल ही इस मुनि को एक स्त्री के साथ देखा था |
अभी उस स्त्री को कहीं भेज दिया गया है |
यह सुनते ही धिक्-धिक् करते हुए आधी भीड़ छंट गई |
जो बची वह मुनि को सताने लगी |
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मुनि ने आरोप समाहित नहीं होने तक अन्न-जल का त्याग करके कायोत्सर्ग में रहने का संकल्प लिया |
देव प्रयोग से वेगवती का मुंह श्याम हो गया |
यह देखते ही पिता ताड़ गया |
पिता ने वेगवती को डांटते हुए कहा -
" तुरंत मुनि से क्षमायाचना करके आओ |"
वेगवती ने मुनि से क्षमायाचना की,
पर इस असत्य आचरण का प्रायश्चित्त नहीं किया |
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उस पाप के कारण रावण के घर सीता के रूप में भोगा |
आखिर कलंकिता होना ही पड़ा |
*- शासन गौरव साध्वी श्री राजीमतीजी*
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नोट - सीता जी को जैन धर्म में "महासती" कहा जाता है |
जैसे भगवान महावीर के पिछले कर्म उनको
अलग-अलग भव में अनेक रूपों से आकर कष्ट देते रहे |
वैसे सीताजी की यह घटना जैन साहित्य में बताई गई है |
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सन्देश - पहले तो ईर्ष्या,
फिर किसी के ऊपर झूठा आरोप लगाना |
अपने जीवन में खुद ही झाँक कर देखे कि
कोई ऐसा कर्म तो नहीं बांध रहे है -
किसी पर मिथ्या आरोप लगाकर - द्वेष-वश !
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