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*■ पुरूषार्थ की धारा ■*


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   *■  पुरूषार्थ की धारा  ■*
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*1-अपने वचन अच्छे रखें क्योंकि सर्वप्रथम ये ही आपका परिचय देते हैं।*

*2-विनयवान व्यक्ति मात्र बड़ों की ही नही। हर किसी की यथायोग्य विनय करता है।*

*3-तत्व निर्णय ही पुरुषार्थ है और उसका फल निश्चिन्तता है।*

*4-उपकारी के उपकार को याद करने का नाम ही तो पूजा है।*

*5-हर असफलता या घटना से कुछ न कुछ शिक्षा लो।*

*6-सही नजरिया, किसी भी परिस्थिति में दुखी नही होने देता।*

*7-निंदा से घबराने वाले, कभी कुछ कर ही नही पाते हैं।*

*8-जीव मौसम की नही, कषाय की गर्मी से दुखी होता है।*

*9-आत्मा का ग्रहण ही, सारे विश्व का त्याग है।*

*10-जीव भगवान न दिखे तो समझना आपके तत्वाभ्यास में कमी है।*
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   *■ जैनम् जयति शासनम् ■*

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