*दिल को छूने वाली कविता*
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दे गई खुशियाँ कई आँखों में तो,
कई नयनों में पानी भर गई ।
बरसी बारिश इस कदर कि,
चारो ओर पानी पानी कर गई ।।
कोई सोया ना रात भर ख़ुशी में,
बारिश मन को खुशहाल कर गई ।
तो कोई चिंतित था आज सोऊँ कहाँ,
बारिश ऐसा हाल बेहाल कर गई ।।
किसी ने बनाया महल सपनों का तो,
किसी का बना आशियां उजाड़ गई ।
कोई तर गया बारिश के *"स्पर्श"* से तो,
देखों कइयों की किस्मत बिगाड़ गई ।
सृजन का प्रतिक है बारिश मग़र ,
कभी कभी रौद्र रूप धर जाती है ।
लाती है सदा खुशियाँ मग़र कभी,
विध्वंस और विप्लव भी कर जा
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