*आज गुरुपूर्णिमा है । गुरदेव श्री के चरणों मे समर्पित
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घोर अंधियारा धुंधली डगर,
सूझे ना कुछ भी अवचेतन मन ।
सफर है लंबा दूर है मंजिल,
पग पग पर अकल्पित कंपन ।
बिंदु को सिंधु तुम ही बनाते,
तुमसे ही ज्योतित दसों दिशाएं ।
प्रकाश स्तंभ हो भवसागर के,
तुमसे ही है ये गुलशन राहें ।
अज्ञानी मन में ज्ञान जगाना,
हे महामना मेरे गुरुवर तुम ।
भटक ना जाऊं मैं राहों से,
राह दिखाना प्रभुवर तुम ।
आलोकित नभ के हे प्रकाशपुंज,
अंतर्मन में ज्योति कर जाओ ।
मिट जाए अंतस के अंधियारे,
*"स्पर्श"* कृपा दृष्टि से कर जाओ
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