*दिल को छूने वाली कविता*
रब लेता रहा पल - पल इम्तिहाँ मेरे,
मैं भी सर झुकाके इम्तिहाँ देता रहा।
यकीन था उसकी रहबरी पे मुझको,
मैं भी राहगीर बन के चलता रहा ।
आए कुछ पल जिंदगी में ऐसे भी,
जहां जिंदगी हार के थक गई थी ।
यकीनन थी राहे भी मुश्किल भरी,
कदमों की आहट भी रुक गई थी ।
एक यहीं विश्वास खींचे जा रहा था ,
कभी तो इंतहा होगी इम्तिहानों की ।
गुजरेगी ये स्याह रातें अंधियारी कभी
कभी तो उजली होगी अरमानों की ।
जो भी कर रहा खुदा अच्छे के लिए,
यही सोच कर रहबरी में खोता गया ।
*स्पर्श* होते गए मंजर फिर खुशियों के,
धीरे - धीरे हर लम्हा हंसी होता गया ।
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रब लेता रहा पल - पल इम्तिहाँ मेरे,
मैं भी सर झुकाके इम्तिहाँ देता रहा।
यकीन था उसकी रहबरी पे मुझको,
मैं भी राहगीर बन के चलता रहा ।
आए कुछ पल जिंदगी में ऐसे भी,
जहां जिंदगी हार के थक गई थी ।
यकीनन थी राहे भी मुश्किल भरी,
कदमों की आहट भी रुक गई थी ।
एक यहीं विश्वास खींचे जा रहा था ,
कभी तो इंतहा होगी इम्तिहानों की ।
गुजरेगी ये स्याह रातें अंधियारी कभी
कभी तो उजली होगी अरमानों की ।
जो भी कर रहा खुदा अच्छे के लिए,
यही सोच कर रहबरी में खोता गया ।
*स्पर्श* होते गए मंजर फिर खुशियों के,
धीरे - धीरे हर लम्हा हंसी होता गया ।
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